Arunay
An Abstract & Contemporary Hindi Poetry
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6:50 PM
फागुन

आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर,
देखेंगे गेहूँ की बाली और आमों पर बोर।
सूरज दिखलने लगा अपना अब ज़ोर,
जंगल में लेता है पतझड़ हिल्लोर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर। 
पलाश पर दिखती है किंशुक की कोर,
रक्तपुष्प, वाकरपुष्प,टेशु हैं चारून ओर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर।
फूलों पर आज कल है भौरों का तौर,
मधु भी है मस्ती भी ,और मौजें बतौर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर।
सूख गये धरती की चूनेर के छोर,
आमो के नीचे अब नाच रहे हैं मोर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर।
महक रहा गुड़, भर गये गन्नो के पोर,
ईमली भी गद्राई , हुआ दक्षिण अभिभोर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर।
सरसों हुई पीली और गठरायी  टोर,
महुआ अब बीनेंगे उठ कर के भोर।
आओ चलें दूर कहीं जंगल की ओर।
मौसम सुहाना है और वसन्ती शोर,
फागुन का स्वागत है, गर्मी उस ओर।
आओ चलें डोर कहीं जंगल की ओर।

Views: 467 | Added by: Arun_Tiwari | Tags: Hindi Abstract Poem, Phagun | Rating: 5.0/1
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